कल्पद्रुम यह समवसरण है, भव्य जीव का शरणागार

कल्पद्रुम यह समवसरण है, à¤­à¤µà¥à¤¯ जीव का शरणागार,

जिनमुख घन से सदा बरसती, à¤šà¤¿à¤¦à¤¾à¤¨à¤‚द मय अमृत धार ॥

 

जहां धर्म वर्षा होती वह, à¤¸à¤®à¤¸à¤°à¤£ अनुपन छविमान,

कल्पवृक्ष सम भव्यजनों को, à¤¦à¥‡à¤¤à¤¾ गुण अनंत की खान।

सुरपति की आज्ञा से धनपति, à¤°à¤šà¤¨à¤¾ करते हैं सुखकार,

निज की कृति ही भासित होती, à¤…ति आश्चर्यमयी मनहार ॥

 

निजज्ञायक स्वभाव में जमकर,प्रभु ने जब ध्याया शुक्लध्यान

मोहभाव क्षयकर प्रगटाया, à¤¯à¤¥à¤¾à¤–्यात चारित्र महान,

तब अंतर्मुहूर्त में प्रगटा, à¤•ेवलज्ञान महासुखकार,,

दर्पण में प्रतिबिम्ब तुल्य जो, à¤²à¥‹à¤•ालोक प्रकाशन हार ॥

 

गुण अनंतमय कला प्रकाशित, à¤šà¥‡à¤¤à¤¨ चंद्र अपूर्व महान,

राग आग की दाह रहित, à¤¶à¥€à¤¤à¤² झरना झरता अभिराग,

जिन वैभव में तन्मय होकर, à¤­à¥‹à¤—ें प्रभु आनंद अपार,

ज्ञेय झलते सभी ज्ञान में, à¤•िन्तु न ज्ञेयों का आधार ॥

 

दर्शन ज्ञान वीर्य सुख से है, à¤¸à¤¦à¤¾ सुशोभित चेतन राज,

चौंतिस अतिशय आठ प्रातिहार्यों से शोभित है जिनराज,

अंतर्बाह्य प्रभुत्व निरखकर, à¤²à¤¹à¥‡à¤‚ अनंत आनंद अपार,

प्रभु के चरण कमल में वंदन, à¤•र पाते सुख शांति अपार ॥