रोम रोम में नेमिकà¥à¤‚वर के, उपशम रस की धारा,
राग दà¥à¤µà¥‡à¤· के बंधन तोडे, वेष दिगमà¥à¤¬à¤° धारा ॥
बà¥à¤¯à¤¾à¤¹ करन को आये, संग बराती लाये,
पशà¥à¤“ं को बंधन में देखा, दया सिंधॠलहराये,
धिक धिक जग की सà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¥ वृतà¥à¤¤à¤¿, कहीं न सà¥à¤•à¥à¤– लघारा ॥
राजà¥à¤² अति अकà¥à¤²à¤¾à¤¯à¥‡, नौ à¤à¤µ की याद दिलाये,
नेमि कहे जग में न किसी का, कोई कà¤à¥€ हो पाये।
रागरूप अंगारों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾, जलता है जग सारा ॥
नौ à¤à¤µ का सà¥à¤®à¤¿à¤°à¤£ कर नेमि, आतम ततà¥à¤µ विचारे,
शाशà¥à¤µà¤¤ धà¥à¤°à¥à¤µ चैतनà¥à¤¯ राज की, महिमा चित में धारे,
लहराता वैरागà¥à¤¯ सिंधॠअब, à¤à¤¾à¤¯à¥‡à¤‚ à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ बारा ॥
राजà¥à¤² के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ राग तजा है, मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ वधू को बà¥à¤¯à¤¾à¤¹à¥‡à¤‚,
नगà¥à¤¨ दिगमà¥à¤¬à¤° दीकà¥à¤·à¤¾ धर कर, आतम धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ लगायें,
à¤à¤µ बंधन का नाश करेंगे, पावें सà¥à¤– अपारा ॥